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338, अन्तर्बहिः स्वं

अन्तर्बहिः स्वं स्थिरजङ्गमेषु  ज्ञात्वाऽऽत्मनाधारतया विलोक्य। त्यक्ताखिलोपाधिरखण्डरूपः पूर्णात्मना यः स्थित एष मुक्तः।। ३३८ -- अन्तःबहिः स्वं स्थिर-जङ्गमेषु  ज्ञात्वा आत्मना आधारतया विलोक्य।  त्यक्त-अखिल-उपाधिः-अखण्डरूपः  पूर्ण-आत्मना यः स्थितः एषः मुक्तः ।। -- अपने आपको भीतर बाहर, चर-अचर, भूतमात्र में विद्यमान एकमात्र अधिष्ठानरूपी अखण्ड आत्मा की तरह देखते हुए, समस्त उपाधियों को त्यागकर, जो पुरुष पूर्ण-आत्मा की तरह स्थित है वह यह पुरुष मुक्त है।  -- One who looks oneself as the only Self that is present in all moving and unmoving, sentient and insentient objects without distinction and as the support and substratum of them, One who relinquishing all adjuncts, ever abides there, is indeed free (Realized). --

389, अन्तः स्वयं चापि

अन्तः स्वयं चापि बहिः स्वयं च  स्वयं पुरस्तात् स्वयमेव पश्चात्।  स्वयं ह्यवीच्यां स्वयमप्युदीच्यां  तथोपरिष्टात्स्वयमप्यधस्तात् ।। ३८९ -- अन्तः स्वयं च अपि बहिः स्वयं च स्वयं पुरस्तात् स्वयं एव पश्चात्।  स्वयं ही अवीच्यां स्वयं अपि उदीच्यां तथा-उपरिष्टात् स्वयं अपि अधस्तात्।।  -- आत्मा अपने ही अन्तर में है, और आत्मा ही बाहर भी है, आत्मा अपने समक्ष है, और आत्मा अपने पृष्ठ की ओर है, आत्मा दक्षिण की दिशा में और आत्मा उत्तर की दिशा में है। आत्मा ऊपर की दिशा में तथा आत्मा नीचे की दिशा में है।  -- The Atman ( Self) is there within our heart,  He is alone without as well, He is before (manifest) us.  He is behind us as well. He is in the south. He is as well in the north. He is there above, and  He is as well there, beneath. --

274, अन्तःश्रिता

अन्तःश्रितानन्तदुरन्तवासना- धूलिविलिप्ता परमात्मवासना।  प्रज्ञातिसंघर्षणतो विशुद्धा प्रतीयते चन्दनगन्धवत् स्फुटम्।। २७४ -- अन्तःश्रिता अनन्त-दुरन्त-वासना- धूलि-विलिप्ता परमात्म-वासना  ।  प्रज्ञातिसंघर्षणतः विशुद्धा  प्रतीयते चन्दनगन्धवत् स्फुटम्।।  -- हृदयान्तर में स्थित परमात्मा को प्राप्त करने की अभिलाषा मानों अनन्त दुरन्त धूलिलिप्त वासना से आच्छादित होती है। इस स्थिति में परमात्मा को जानने (प्रज्ञाति / प्रज्ञान) की उत्कंठा  अन्तःकरण में चन्दन की सुगंध जैसी प्रतीत होती है । -- The urge to see God remains covered, hidden under the dust of endless past impressions in the mind of the seeker. Still, when this urge becomes strong enough, feels like the fragrance of sandal that permeats and purifies his mind. --

282, अनादानविसर्गाभ्यां

अनादानविसर्गाभ्यामीषन्नास्ति क्रिया मुनेः।  तदेकनिष्ठया नित्यं स्वाध्यासापनयं कुरु ।। २८२ -- अनादान-विसर्गाभ्यां ईषत् नास्ति क्रिया मुनेः।  तत् एकनिष्ठया नित्यं स्व-अध्यास-अपनयं  कुरु ।। -- मुनि न तो ग्रहण करता है, न त्याग करता है । चूँकि त्याग या ग्रहण ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों / मन आदि का कार्य है, और मुनि कर्तृत्व-भाव से रहित होने से किसी भी कार्य का कर्ता, भोक्ता आदि नहीं होता। इस प्रकार से एकनिष्ठ होकर सदैव अध्यासमात्र का निरसन करो। -- The sage neither accepts nor rejects and has nothing to do with the actions performed by the senses and sense organs or organs of action. Prompted by this and keeping this in mind, always remove all identification with all those actions whether performed by mind or by the  physical organs. --

103, अन्तःकरणमेतेषु

अन्तःकरणमेतेषु चक्षुरादिषु वर्ष्मणि । अहमित्याभिमानेन तिष्ठत्याभासतेजसा।। १०३ -- अन्तःकरणं एतेषु चक्षुः आदिषु वर्ष्मणि । अहं इति अभिमानेन तिष्ठति आभास-तेजसा।। --  अन्तःकरण / चेतना नामक मन-बुद्धि-चित्त-अहं-चतुष्टय, चक्षु इत्यादि इन्द्रियों / अंगों में अहंकार-रूपी अभिमान की तरह आभास-तेज-सहित व्याप्त रहता है।  -- The consciousness (mind) with the reflection of Cit (awareness) as ego permeats within the senses and is identified / associated with them. --

185, अनुव्रजत्

अनुव्रजच्चित्प्रतिबिम्बशक्तिर्विज्ञानसंघः प्रकृतेर्विकारः । ज्ञानक्रियावानहमित्यजस्रं देहेन्द्रियादिष्वभिमन्यते भृशम्।। १८५ -- अनुव्रजत् चित्-प्रतिबिम्ब-शक्तिः  विज्ञानसंघः प्रकृतेः विकारः।  ज्ञान-क्रियावान्-अहं इति अजस्रं  देह-इन्द्रिय-आदिषु अभिमन्यते भृशम्।। -- इस विज्ञानमय-कोष का, जो सदा ही,  प्रतिबिम्बित चित् शक्ति से युक्त प्रकृति के विकार से उत्पन्न हुआ विज्ञान-समुच्चय मात्र है, अनुसरण करता हुआ ज्ञान तथा क्रिया शक्ति से युक्त अहंकार अनादिकाल से, अपने आपको देह तथा इन्द्रियों में स्थित हुआ मान बैठता है। -- The knowledge-sheath which is a modification of prakriti (nature), endowed with the light of Cit (aware-ness), assumes itself the timeless ever-present ego, comprising of all Intellect and action, thus identifies itself with the body and senses .... --

83, अनुक्षणम्

अनुक्षणं यत्परिहृत्य कृत्यमनाद्यविद्याकृतबन्धमोक्षम् । देहः परार्थोऽयममुष्यपोषणे यः सज्जते स स्वमनेन हन्ति।। ८३ -- अनुक्षणं यत् परिहृत्य कृत्यं अनादि-विद्या-कृत-बन्ध-मोक्षम् । देहः परार्थः अयं अमुष्य पोषणे यः सज्जते सः स्वं अनशन हन्ति।। -- अनादि अविद्या से प्राप्त हुए बन्धन से अपनी आत्मा का मोक्ष कैसे हो, इस ओर ध्यान तक न देकर, जो मनुष्य क्षण प्रतिक्षण इस देह का ही पोषण करने में संलग्न रहता है, जिसका औरों के द्वारा ही उपयोग किया जाता है, वह इस प्रकार अपने आप की हत्या ही कर लेता है।  -- Leaving aside what is needed be done to free oneself from the beginingless ignorance, one who keeps caring moment to moment for and nourishing this body, which is of no use to him but is useful only for others, in a way thereby commits suicide only. --