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103, अन्तःकरणमेतेषु

अन्तःकरणमेतेषु चक्षुरादिषु वर्ष्मणि । अहमित्याभिमानेन तिष्ठत्याभासतेजसा।। १०३ -- अन्तःकरणं एतेषु चक्षुः आदिषु वर्ष्मणि । अहं इति अभिमानेन तिष्ठति आभास-तेजसा।। --  अन्तःकरण / चेतना नामक मन-बुद्धि-चित्त-अहं-चतुष्टय, चक्षु इत्यादि इन्द्रियों / अंगों में अहंकार-रूपी अभिमान की तरह आभास-तेज-सहित व्याप्त रहता है।  -- The consciousness (mind) with the reflection of Cit (awareness) as ego permeats within the senses and is identified / associated with them. --

94, अत्राभिमानादहमिति

अत्राभिमानादहमित्यहङ्कृतिः । स्वार्थानुसन्धानगुणेन चित्तम् ।। ९४ -- अत्र अभिमानात् अहं इति अहङ्कृतिः।  स्वार्थ-अनुसन्धान-गुणेन चित्तम्।।  -- प्रस्तुत श्लोक से पूर्व का श्लोक इस प्रकार से है : निगद्यतेऽन्तःकरण मनोधी- रहङ्कृतिश्चित्तमिति स्ववृत्तिभिः।  मनस्तु संकल्पविकल्पनादिभि- र्बुद्धिः पदार्थाध्यवसायधर्मतः।। ९२ -- निगद्यते अन्तःकरणं मनः-धीः-अहङ्कृतिः-चित्तं इति स्ववृत्तिभिः। मनः तु संकल्प-विकल्प-अनादिभिः बुद्धिः पदार्थ-अध्यवसाय-धर्मतः ।। अन्तःकरण के मन, बुद्धि, अहंकार तथा चित्त ये चार अवयव कहे जाते हैं जिनके आधार पर इसे अन्तःकरण-चतुष्टय भी कहते हैं।  इनमें से मन, अनादितः संकल्प-विकल्प की वृत्ति का नाम है।  बुद्धि विषयों से संबद्ध होनेवाली वृत्ति-विशेष है। ये विषय भी पुनः बाह्य अथवा आन्तरिक हो सकते हैं।  इसके बाद श्लोक ९४ में देहाभिमान को अहङ्कृतिः कहा गया है, जो इसी प्रकार स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर या कारण-शरीर से संबद्ध देहाभिमान के रूप में होता है। इसी अहङ्कृतिः से प्रेरित स्वार्थ की भावना का नाम चित्त है।  -- This verse referes to earlier one 93, wh...