Posts

Showing posts with the label 406

Verbatim (अधिष्ठान और आरोपण)

यह पोस्ट* संयोगजनित भूल से मेरे स्वाध्याय ब्लॉग में लिख दी गई, जिसे अब यथास्थान पुनः लिखा जा रहा है, यद्यपि इसे उस ब्लॉग में भी देखा जा सकता है। I had inadvertently posted this post* in my another (swaadhyaaya) blog, so now reposting here at its right place. * (406, अनन्यत्वमधिष्ठानादारोप्यस्य)  -- 406, अनन्यत्वमधिष्ठानादारोप्यस्य....  अनन्यत्वमधिष्ठानादारोप्यस्य निरीक्षितम्। पण्डितै रज्जुसर्पादौ विकल्पो भ्रान्तिजीवनः।। ४०६ -- अनन्यत्वं अधिष्ठानात् आरोप्यस्य निरीक्षितम्।  पण्डितैः रज्जु-सर्प-आदौ विकल्पः भ्रान्ति-जीवनः ।। -- जिसे अधिष्ठान पर आरोपित कर दिया जाता है,  उस आरोपित को अधिष्ठान से अनन्य मान लेना ही, आरोपित की सत्यता के आभास को उत्पन्न करता है।  पण्डितों के अनुसार, रज्जु में आरोपित सर्प को सत्य मान लेना ही वैकल्पिक सर्प के सत्य होने का भ्रम पैदा करता है।  -- Instead of seeing the very object itself, SEEING  an image superimposed upon the object causes the illusion that the image has its own reality, quite different and independent of the object...