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179, अध्यासदोषात्

अध्यासदोषात्पुरुषस्य संसृति- रध्यासबन्धस्त्वमुनैवकल्पितः । रजस्तमोदोषवतोऽविवेकिनो जन्मादिदुःखस्य निदानमेतत्।। १७९ -- अध्यास-दोषात् पुरुषस्य संसृतिः अध्यास-बन्धः तु अमुना एव कल्पितः।  रजः तमः दोषवतः अविवेकिनः जन्म-आदि दुःखस्य निदानं एतत्।।  -- अनात्म पदार्थों से आत्मा का तादात्म्य होना ही पुरुष की संसृति (का कारण) है। यह तादात्म्यरूपी बन्धन भी उसी के द्वारा कल्पित होता है। रजोगुण तथा तमोगुणसे युक्त अविवेकी जनों के दुःख का यही निदान (मूल कारण) है।  -- Identification of the Self with the Non-self is alone the cause of repeated births and rebirths of man. This bondage that is identification, is again but imagined only by him. Because of this identification, those who lack the discrimination and whose mind's are tainted with the rajas (the attribute / गुण) and tamas (the attribute /गुण) have to go through misery . This is the reason of their misery. -- 

138, अतस्मिंस्तद्बुद्धिः

अतस्मिंस्तद्बुद्धिः प्रभवति विमूढस्य तमसा विवेकाभावाद्वै स्फुरति भुजगे रज्जुधिषणा।  ततोऽनर्थव्रातो निपतति समादातुरधिक- स्ततो योऽसद्ग्राहः स हि भवति बन्धः शृणु सखे।। १३८ -- अ-तस्मिन्-तत्-बुद्धिः प्रभवति विमूढस्य तमसा  विवेक-अभावात् वै स्फुरति भुजगे रज्जु-धिषणा। ततः अनर्थ-व्रातः निपतति समादातुः अधिकः ततः यः असद्ग्राहः सः हि भवति बन्धः शृणु सखे।।  -- जो मोहित-बुद्धि है, अज्ञानवश जो वस्तुतः जैसा है, उसे उससे भिन्न किसी और ही रूप और प्रकार से मान बैठता है। विवेक के अभाव के ही कारण मनुष्य को रस्सी सर्प जैसी  प्रतीत होती है। इसके फलस्वरूप अनेक विपत्तियाँ और उपद्रव उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार से वस्तुओं का उनके अवास्तविक रूप में ग्रहण किया जाना ही बंधन है। -- One possessed by ignorance, mistakes things for something other than what they really are. Because of the lack of discrimination, one takes a rope as if it is a snake. When one has such a wrong notion about the world,  great calamities come upon him. So, O friend! It is, how looking the transience (feature) of thin...

47, अज्ञानयोगात्

अज्ञानयोगात्परमात्मनस्तव  ह्यनात्मबन्धस्तत एव संसृतिः । तयोर्विवेकोदितबोधवह्नि- रज्ञानकार्यं प्रदहेत्समूलम् ।। ४७ -- अज्ञानयोगात् परमात्मनः तव  हि अनात्म-बन्धः ततः एव संसृतिः।  तयोः विवेक-उदित बोध-वह्निः अज्ञानकार्यं प्रदहेत् समूलम् ।। -- अज्ञान के कारण ही तुम्हारा परम वास्तविक आत्म-स्वरूप अनात्म से बंधनयुक्त प्रतीत हो रहा है। इस अज्ञान से ही संसृति अर्थात् जन्म-मृत्यु का सतत चक्र है। विवेकजनित ज्ञान का यही कार्य है कि अज्ञान और संसृति, दोनों ही बोध रूपी उस अग्नि में जलकर समूल नष्ट हो जाते हैं। -- Because of ignorance of your true nature,  Who is Supreme Reality / Brahman / आत्मन् ,  you , you are caught in this bondage of the cycle of repeated births and deaths. This is the very bondage with the non-self / अनात्मन् . The fire of awakening kindled by the discrimination burns up the ignorance and the bondage as well. -- --