Posts

Showing posts with the label identification

179, अध्यासदोषात्

अध्यासदोषात्पुरुषस्य संसृति- रध्यासबन्धस्त्वमुनैवकल्पितः । रजस्तमोदोषवतोऽविवेकिनो जन्मादिदुःखस्य निदानमेतत्।। १७९ -- अध्यास-दोषात् पुरुषस्य संसृतिः अध्यास-बन्धः तु अमुना एव कल्पितः।  रजः तमः दोषवतः अविवेकिनः जन्म-आदि दुःखस्य निदानं एतत्।।  -- अनात्म पदार्थों से आत्मा का तादात्म्य होना ही पुरुष की संसृति (का कारण) है। यह तादात्म्यरूपी बन्धन भी उसी के द्वारा कल्पित होता है। रजोगुण तथा तमोगुणसे युक्त अविवेकी जनों के दुःख का यही निदान (मूल कारण) है।  -- Identification of the Self with the Non-self is alone the cause of repeated births and rebirths of man. This bondage that is identification, is again but imagined only by him. Because of this identification, those who lack the discrimination and whose mind's are tainted with the rajas (the attribute / गुण) and tamas (the attribute /गुण) have to go through misery . This is the reason of their misery. -- 

94, अत्राभिमानादहमिति

अत्राभिमानादहमित्यहङ्कृतिः । स्वार्थानुसन्धानगुणेन चित्तम् ।। ९४ -- अत्र अभिमानात् अहं इति अहङ्कृतिः।  स्वार्थ-अनुसन्धान-गुणेन चित्तम्।।  -- प्रस्तुत श्लोक से पूर्व का श्लोक इस प्रकार से है : निगद्यतेऽन्तःकरण मनोधी- रहङ्कृतिश्चित्तमिति स्ववृत्तिभिः।  मनस्तु संकल्पविकल्पनादिभि- र्बुद्धिः पदार्थाध्यवसायधर्मतः।। ९२ -- निगद्यते अन्तःकरणं मनः-धीः-अहङ्कृतिः-चित्तं इति स्ववृत्तिभिः। मनः तु संकल्प-विकल्प-अनादिभिः बुद्धिः पदार्थ-अध्यवसाय-धर्मतः ।। अन्तःकरण के मन, बुद्धि, अहंकार तथा चित्त ये चार अवयव कहे जाते हैं जिनके आधार पर इसे अन्तःकरण-चतुष्टय भी कहते हैं।  इनमें से मन, अनादितः संकल्प-विकल्प की वृत्ति का नाम है।  बुद्धि विषयों से संबद्ध होनेवाली वृत्ति-विशेष है। ये विषय भी पुनः बाह्य अथवा आन्तरिक हो सकते हैं।  इसके बाद श्लोक ९४ में देहाभिमान को अहङ्कृतिः कहा गया है, जो इसी प्रकार स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर या कारण-शरीर से संबद्ध देहाभिमान के रूप में होता है। इसी अहङ्कृतिः से प्रेरित स्वार्थ की भावना का नाम चित्त है।  -- This verse referes to earlier one 93, wh...