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531, अयमात्मा नित्यसिद्धः

अयमात्मा नित्यसिद्धः प्रमाणे सति भासते ।। न देशं नापि वा कालं न शुद्धिं वाप्यपेक्षते ।।५३१।। -- अन्वय : अयं आत्मा नित्यसिद्धः प्रमाणे सति भासते । न देशं न अपि वा कालं न शुद्धिं वा अपेक्षते ।। अर्थ : यह आत्मा नित्य ही स्वतःसिद्ध ही है। किसी भी वस्तु या तथ्य की सत्यता सिद्ध करने के लिए, इसका कोई प्रमाण दिया जाना आवश्यक होता है, किन्तु आत्मा, अर्थात् अपने स्वयं के होने का प्रमाण दिए जाने का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता। अपने होने का यह तथ्य यद्यपि हर प्राणी को अनायास ही ज्ञात होता है, किन्तु अपनी आत्मा का यथार्थ तत्व या रहस्य क्या है, इसे जानने के लिए जिज्ञासा, प्रयास, अन्वेषण किया जाना अपेक्षित होता है।  अपने आपका यह तत्व यद्यपि किसी प्रमाण के अनुसार सतत ही बदलता हुआ सा प्रतीत होता है, किन्तु यदि वह इस प्रकार से परिवर्तित हो सकता होता, तो किसी प्रमाण के होने या न होने का प्रश्न ही कहाँ उठता! इसलिए प्रमाण होने पर ही मन तत्काल ही आत्मा, या इस तत्व को समय, स्थान और स्थिति के अनुसार पुनः पुनः परिभाषित कर लेता है, जबकि अपना आत्म-तत्व इस प्रकार की किसी परिभाषा से नितान्त अप्रभावित रहता हुआ ह...

389, अन्तः स्वयं चापि

अन्तः स्वयं चापि बहिः स्वयं च  स्वयं पुरस्तात् स्वयमेव पश्चात्।  स्वयं ह्यवीच्यां स्वयमप्युदीच्यां  तथोपरिष्टात्स्वयमप्यधस्तात् ।। ३८९ -- अन्तः स्वयं च अपि बहिः स्वयं च स्वयं पुरस्तात् स्वयं एव पश्चात्।  स्वयं ही अवीच्यां स्वयं अपि उदीच्यां तथा-उपरिष्टात् स्वयं अपि अधस्तात्।।  -- आत्मा अपने ही अन्तर में है, और आत्मा ही बाहर भी है, आत्मा अपने समक्ष है, और आत्मा अपने पृष्ठ की ओर है, आत्मा दक्षिण की दिशा में और आत्मा उत्तर की दिशा में है। आत्मा ऊपर की दिशा में तथा आत्मा नीचे की दिशा में है।  -- The Atman ( Self) is there within our heart,  He is alone without as well, He is before (manifest) us.  He is behind us as well. He is in the south. He is as well in the north. He is there above, and  He is as well there, beneath. --